Skip to content
Cash on Delivery Available 3-Day Easy Returns Earn Embers Cashback on Every Order

रूम नंबर 1504 का राज

सुछन्दा डे
एक हत्या की गुत्थी के पीछे, एक पुरानी मुलाकात की कहानी…
ग्यारह वर्ष पहले की बात है — सरदार बल्लभ भाई पटेल नैशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद। आईपीएस ऑफिसर की ट्रेनिंग के सख्त ग्यारह महीने। अनुशासन की शृंखला में बंधी दिनचर्या जो उन्हें आने वाले जीवन के लिए प्रशिक्षित करती है।
सुबह 4:30 बजे के अलार्म से सिद्धांत की आँख खुली। दिसंबर की सर्दी में कंबल से निकलने का मन नहीं कर रहा था। आलस्य ने कहा बस दो मिनट और। यह दो मिनट कब बीस मिनट हो गए पता ही नहीं चला। उसने घड़ी देखी तो हड़बड़ाहट में उठा। 5 बजे पीटी ग्राउंड पर एकत्रित होना था। उसने किसी तरह मुँह धो के ड्रेस पहनी और भागा।
वहाँ पहुँचते ही ट्रेनर ने कहा “सिद्धांत ठाकुर, आपने शेव नहीं किया है। आज शाम 6 बज कर 5 मिनट पर 5 किलोमीटर की दौड़ के लिए मुझे यहाँ मिलने चाहिए।”
“सर!”
“आगे ऐसी गलती हुई तो 10 किलोमीटर के लिए तैयार रहिएगा।”
दिन भर सिद्धांत ट्रेनिंग ऑफिसर को मन ही मन गालियाँ देता रहा और शाम ठीक 6 बजे दोबारा ग्राउंड पर पहुँच गया। कुल 4 लोग थे आज इस पनिशमेन्ट पर अलग-अलग वजहों से। उन्होंने दौड़ शुरू की। अचानक दौड़ते हुए सिद्धांत की नजर दूर एक लड़की पर पड़ी। सफेद सलवार-कमीज़ पे एक हरा दुपट्टा ओढ़े वो बहुत जल्दी-जल्दी चल के कहीं जा रही थी। उसके बाल कमर से भी नीचे तक लंबे थे। खुले हुए बाल बार-बार हवा से उड़ रहे थे, वो बार-बार उन्हें अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रही थी। पता नहीं क्यों उसे देख कर सिद्धांत के होंठों पर हल्की मुस्कराहट आ गई। इतने में सिद्धांत को दौड़ते हुए ग्राउंड में मुड़ना पड़ा तो उसे वो लड़की दिखनी बंद हो गई, वो जब तक वापिस उस दिशा में आया तो वो वहाँ नहीं थी।
उस रात पता नहीं क्यों उसकी आँखों के आगे बार-बार वो दृश्य आ जा रहा था। उसके बैच में चार महिला ऑफिसर थीं, उनमें से किसी के बाल इतने लंबे नहीं थे तो इस कैंपस में कौन थी वो।
अगले दिन सुबह उसका रूममेट अक्षत तबियत खराब होने की वजह से मेडिकल सेंटर में भर्ती हो गया। शाम को क्लासेज खत्म होने के बाद सिद्धांत उससे मिलने पहुँचा। अक्षत लगभग नींद में था। तभी उसने एक मीठी-सी आवाज सुनी, “सिस्टर, पेशेंट की ब्लड रिपोर्ट आ गई।”
उसने पीछे मुड़ कर देखा तो जैसे उसके दिल की धड़कन ठहर गई। यह यकीनन पिछले दिन की वही लड़की थी। आज उसने हल्के गुलाबी रंग की सलवार कमीज पहने हुए थी। उसके घुटनों तक लंबे बाल उसने आज एक कल्चर में नियंत्रित किए हुए थे। रंग एकदम दूध जैसा मानो छू दो तो मैला हो जाये। बड़ी-बड़ी आँखें। और उसके दाहिने गाल पर एक बहुत ही प्यारा तिल। सिद्धांत उसे देखता ही रह गया। कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है!
अचानक सिस्टर के हाथ से कुछ गिरा तो उसे होश आया। उस लड़की ने उसकी ओर देख कर कहा, “हाई, आई एम डॉक्टर शुभ्रा।”
“हाई, आई एम सिद्धांत ठाकुर।”
“आपके दोस्त की रिपोर्ट से पता चलता है कि घबराने की कोई बात नहीं। वायरल ही है, लेकिन क्योंकि बुखार ज्यादा है, दो दिन हम निगरानी में रखेंगे।”
“नहीं नहीं आप आराम से ज्यादा दिन रखिए। मैं रोज आके आपसे मिल लूँगा।”
“जी??”
“मेरा मतलब है, आपसे मिल के अक्षत की प्रोग्रेस पता कर लूँगा।”
शुभ्रा ने कुछ नहीं बोला। सिस्टर को कुछ समझा के वो अगले पेशेंट की ओर चल दी। सिद्धांत उसे जाता हुआ देखता रहा।
कुछ हफ्तों बाद, सिद्धांत का जन्मदिन था। माँ के बहुत कहने पर शाम को परमिशन लेके वो जगन्नाथ मंदिर गया। दर्शन कर के वो बाहर निकला ही था, कि अचानक सामने से बाइक पर सवार दो लड़के उल्टी तरफ से आए, उसके आगे चल रहे एक बुजुर्ग को धक्का दिया, उनकी घड़ी छीनी और तेजी से आगे बढ़ गए। सिद्धांत ने उन्हें पकड़ कर पुलिस के हवाले किया और घड़ी लौटाने उन बुजुर्ग के पास गया।
“सर, आपकी घड़ी।”
“शुक्रिया बेटा। मेरा घर पास में ही है, अगर हो सके तो एक ऑटो बुला दो।”
सिद्धांत उनके साथ उनके घर तक गया। ऑटो से उतर कर उसने देखा घर के आगे नेम प्लेट लगा है — बृजेश शर्मा, डॉ एस शर्मा।
दरवाजे की घंटी बजाते ही अंदर से आवाज आनी शुरू हुई “कितनी देर कर दी पापा, मैं…” कहते हुए दरवाजा खुला और खोलने वाली ने अपने पिता को देखते ही कहा “पापा क्या हो गया आपको?”
सिद्धांत को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ — वही लड़की थी। बृजेश शर्मा ने संक्षेप में घटना बताई तो शुभ्रा ने सिद्धांत की ओर देखा, “थैंक यू! पापा की मदद करने के लिए। वैसे मैंने शायद आपको कहीं देखा है… हाँ याद आया, अकादमी में।”
“मैं अच्छी कॉफी बनाती हूँ। पी के जाइए ना।”
सिद्धांत ना नहीं कर पाया। शुभ्रा जब कॉफी बना कर लाई तो पूछा, “यह जगह तो अकादमी से काफी दूर है। आप किसी काम से आए थे?”
“जी वो जगन्नाथ मंदिर आया था। दरअसल, आज मेरा जन्मदिन है तो माँ ने कहा था कि मंदिर चला जाऊँ।” कहते हुए सिद्धांत के चेहरे पर बच्चों की सी मासूमियत आ गई।
बाद में शुभ्रा ने कई बार कहा था कि उस दिन सिद्धांत के चेहरे की मासूमियत ने ही उसके दिल के तारों को छेड़ दिया था।
“हैप्पी बर्थडे मिस्टर ठाकुर।”
“थैंक यू। आप मुझे सिद्धांत कहेंगी तो अच्छा लगेगा।”
“तो जब कॉफी पीनी हो तो आपको कैसे कॉन्टैक्ट करूँ?” सिद्धांत ने पूछा।
शुभ्रा हँस दी “अच्छा तरीका है लड़कियों से फोन नंबर मांगने का। ठीक है लिख लीजिए।” कहकर उसने अपना नंबर दे दिया।
दो सप्ताह बाद सिद्धांत ने फोन किया और बिना किसी लाग लपेट के पूछा “क्या आज शाम मुझे अपना तोहफा मिल सकता है?”
शाम को एक रेस्तराँ में दोनों मिले। एक-एक कप कॉफी पर कुछ देर बात हुई और निकलने से पहले अगली कॉफी पे मिलने का वादा।
कब यह कॉफी उनकी आदत से उनकी जिंदगी बन गई, पता ही नहीं चला।
फिर क्या हुआ कि यह कहानी दिल्ली के एक होटल की पंद्रहवीं मंजिल तक जा पहुँची? सिद्धांत और शुभ्रा के बीच आज इतनी दूरी क्यों है? जानने के लिए पढ़िए “Room No 1504” — पूरी कहानी, पूरा रहस्य।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WhatsApp