
The Civil Serpents (Hindi) - -
Original price was: ₹249.₹224Current price is: ₹224. (-10%)

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The Civil Serpents (Hindi)
The Civil Serpents | द सिविल सरपेंट्स
श्री विनय प्रकाश तिर्की की यह कृति केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र का आईना है, जिसकी आत्मा लालफीताशाही में उलझी हुई है और जिसकी रगों में विश्वासघात का ज़हर बहता है। यह कथा उन अदृश्य जालों को उजागर करती है, जहाँ सहयोग की आड़ में धोखे की साँसें चलती हैं और हर मुस्कान के पीछे छुपा होता है एक फनधारी इरादा।
इस व्यवस्था में व्यक्ति कब अपने ही सहकर्मियों द्वारा छल लिया जाता है, उसे आभास तक नहीं होता। ऊँचे ओहदों पर बैठे अधिकारी, अपने नीचे काम करने वालों का शोषण ऐसे करते हैं जैसे वन का कोई विषधर अपने शिकार को निगलता है- धीरे, सधे हुए अंदाज़ में।
लेखक स्वयं नागलोक कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर अंचल से हैं—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ साँपों की अनगिनत प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इन वनों में साँपों से हुई उनकी मुठभेड़ों ने उन्हें सिखाया कि असली विषधर केवल जंगलों में ही नहीं, बल्कि सभ्यता की चादर ओढ़े शहरों में भी पाए जाते हैं- कंक्रीट के इस जंगल में वे मनुष्य का मुखौटा पहन कर विचरण करते हैं।
इच्छाधारी नाग या नागिन चाहे कल्पना मात्र हों, किंतु इस ‘सिस्टम’ के साँप उनसे कहीं अधिक चतुर, घातक और जीवित हैं। उनका धोखा, उनकी दोहरी ज़ुबान और विषैली चुप्पी, इस संघर्षशील प्रशासनिक जीवन की अनिवार्यता बन चुकी है।
यह पुस्तक एक चेतावनी है, एक दर्शन है—’सिविल सर्पेंट सिस्टम’ का। लेखक की विशिष्ट और व्यंग्यपूर्ण लेखन शैली इसे केवल पढ़ने योग्य नहीं, बल्कि महसूस करने योग्य बनाती है- मानव और नाग के बीच की पतली रेखा को पाठक स्वयं पहचानने लगते हैं।
| Weight | 250 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 17 × 2 cm |
| Format | पेपरबैक |
| Language | हिंदी |
| Number of Pages | 200 |
The Civil Serpents (Hindi)
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The Civil Serpents | द सिविल सरपेंट्स
श्री विनय प्रकाश तिर्की की यह कृति केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र का आईना है, जिसकी आत्मा लालफीताशाही में उलझी हुई है और जिसकी रगों में विश्वासघात का ज़हर बहता है। यह कथा उन अदृश्य जालों को उजागर करती है, जहाँ सहयोग की आड़ में धोखे की साँसें चलती हैं और हर मुस्कान के पीछे छुपा होता है एक फनधारी इरादा।
इस व्यवस्था में व्यक्ति कब अपने ही सहकर्मियों द्वारा छल लिया जाता है, उसे आभास तक नहीं होता। ऊँचे ओहदों पर बैठे अधिकारी, अपने नीचे काम करने वालों का शोषण ऐसे करते हैं जैसे वन का कोई विषधर अपने शिकार को निगलता है- धीरे, सधे हुए अंदाज़ में।
लेखक स्वयं नागलोक कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर अंचल से हैं—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ साँपों की अनगिनत प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इन वनों में साँपों से हुई उनकी मुठभेड़ों ने उन्हें सिखाया कि असली विषधर केवल जंगलों में ही नहीं, बल्कि सभ्यता की चादर ओढ़े शहरों में भी पाए जाते हैं- कंक्रीट के इस जंगल में वे मनुष्य का मुखौटा पहन कर विचरण करते हैं।
इच्छाधारी नाग या नागिन चाहे कल्पना मात्र हों, किंतु इस ‘सिस्टम’ के साँप उनसे कहीं अधिक चतुर, घातक और जीवित हैं। उनका धोखा, उनकी दोहरी ज़ुबान और विषैली चुप्पी, इस संघर्षशील प्रशासनिक जीवन की अनिवार्यता बन चुकी है।
यह पुस्तक एक चेतावनी है, एक दर्शन है—’सिविल सर्पेंट सिस्टम’ का। लेखक की विशिष्ट और व्यंग्यपूर्ण लेखन शैली इसे केवल पढ़ने योग्य नहीं, बल्कि महसूस करने योग्य बनाती है- मानव और नाग के बीच की पतली रेखा को पाठक स्वयं पहचानने लगते हैं।
| Weight | 250 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 17 × 2 cm |
| Format | पेपरबैक |
| Language | हिंदी |
| Number of Pages | 200 |
The Civil Serpents (Hindi)
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