Additional information
| Weight | 200 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 17 × 2 cm |
| Format | पेपरबैक |
| Language | हिंदी |
| Number of Pages | 170 |

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Tarai
तराई- हमेशा पानी से भरे नदी -नौखान, पहाड़ी नालों से उफनती जल की धारा इस भूमि को सदा ही नम और उर्वर बनाये रखती है। खेतों में तीन फसलों का चक्र, नदी, नौखान और पहाड़ी नालों में इफरात मछलियाँ और जंगल की अथाह वन सम्पदा इस क्ष्रेत्र की थाती है। तराई में सभी के घर दो जून का चूल्हा जलने का जतन कुदरत कर ही देती है। तराई का यह हरा -भरा क्षेत्र थोड़ा सा गरीब तो माना जा सकता है मगर दरिद्र नहीं। नदी और जंगल सब कुछ देते हैं पर किसी का लालच तो पूरा नहीं कर सकते। जंगल की लकड़ी और नदी की बालू अब सरकार के हैं। सरकार के यानी सभी के और पूरी तरह किसी के नहीं। तराई की भूमि पर लिखना मेरे लिए एक ऋण था, क्योंकि सैंकड़ो साल पहले मेरे पूर्वजों ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए गुजरात के पाटन क्षेत्र से जब पलायन किया था तब उन्हे तराई की भूमि ने ही आसरा दिया था। मैंने तराई का अन्न -जल खाया -पिया तो उस पर लिखना लाजिमी था। इस उपन्यास के परिवेश और संसाधन भी इसके किरदार हैं और जिसमें सबसे प्रमुख है बालू। नदी की बालू का असीमित दोहन और इंसान के असीमित लालच से पैदा हुई हैं टकराव से रची -गुंथी तराई के किस्से और कहानियाँ।
| Weight | 200 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 17 × 2 cm |
| Format | पेपरबैक |
| Language | हिंदी |
| Number of Pages | 170 |
| Weight | 200 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 17 × 2 cm |
| Format | पेपरबैक |
| Language | हिंदी |
| Number of Pages | 170 |
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