
Maya Mari Na Man Mara - -
Original price was: ₹249.00.₹224.00Current price is: ₹224.00. (-10%)

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Maya Mari Na Man Mara
इस पुस्तक को तीन भागों, “चदरिया झीनी रे”, “सुनो भाई साधो” और “माया का सुख चार दिन“ में विभाजित किया गया है। सम्बन्ध सुखदायक होते हैं लेकिन सुख यदि अकेले आ जाये तो वो सुख नहीं होता । सुख की पूर्णता ही दुःख से है। दोनों का समान रूप से रसास्वादन लेने के उपरान्त ही अनुभव को पूर्ण कहा जा सकता है। मैंने प्रथम भाग में उन दुखों को देखने कि कोशिश की है जो सुख या सुख कि उम्मीद से जन्म लेते हैं। सम्बन्ध के अवलोकन में सम्बन्ध कि गहराई, नजदीकी और जीवन पर उसका प्रभाव मायने रखता है। कोशिश की है कि जहाँ जहाँ मुझसे चूक हुई है या मेरी वृत्तियों ने मुझे जिन बेईमानियों कि तरफ धकेला उनका मैं आंकलन कर पाऊं और उसकी पूरी जिम्मेदारी स्वयं ले पाऊं। जैसे को तैसा देखने भर कि कोशिश ही जिम्मेदारी का पहला कदम है। मैं उस कोशिश में खरा उतरना चाहता हूँ। इस भाग में मैं एक प्रेम सम्बन्ध से लेकर वैवाहिक सम्बन्ध तक से उभरे मनोभावों का अवलोकन करने कि कोशिश की है। यह प्रश्न उठ सकता है कि, ऐसा करना जरुरी क्यूँ है? फिर इसके उत्तर में एक और प्रश्न मुस्कान लिए खड़ा होता है कि ऐसा न करना क्या खुद को छुपा लेना नहीं है ? खुद को उघाड़ देना ही तो मेरा होना है। मैं मेरे होने से कैसे बच सकता हूँ। इसीलिए तो मेरे होने को मैं इस किताब के दूसरे और तीसरे भाग तक ले गया; जहाँ मैं हर उस, चीज, जगह, पशु, पक्षी, कीट, पतंगे और इंसान से सम्बन्ध बनाता हुआ पाता हूँ जिनसे मैं सामाजिक रूप से उस सम्बन्ध के लिए कोई नाम नहीं दे सकता।
| Format | पेपरबैक |
|---|---|
| Language | हिंदी |
Maya Mari Na Man Mara
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इस पुस्तक को तीन भागों, “चदरिया झीनी रे”, “सुनो भाई साधो” और “माया का सुख चार दिन“ में विभाजित किया गया है। सम्बन्ध सुखदायक होते हैं लेकिन सुख यदि अकेले आ जाये तो वो सुख नहीं होता । सुख की पूर्णता ही दुःख से है। दोनों का समान रूप से रसास्वादन लेने के उपरान्त ही अनुभव को पूर्ण कहा जा सकता है। मैंने प्रथम भाग में उन दुखों को देखने कि कोशिश की है जो सुख या सुख कि उम्मीद से जन्म लेते हैं। सम्बन्ध के अवलोकन में सम्बन्ध कि गहराई, नजदीकी और जीवन पर उसका प्रभाव मायने रखता है। कोशिश की है कि जहाँ जहाँ मुझसे चूक हुई है या मेरी वृत्तियों ने मुझे जिन बेईमानियों कि तरफ धकेला उनका मैं आंकलन कर पाऊं और उसकी पूरी जिम्मेदारी स्वयं ले पाऊं। जैसे को तैसा देखने भर कि कोशिश ही जिम्मेदारी का पहला कदम है। मैं उस कोशिश में खरा उतरना चाहता हूँ। इस भाग में मैं एक प्रेम सम्बन्ध से लेकर वैवाहिक सम्बन्ध तक से उभरे मनोभावों का अवलोकन करने कि कोशिश की है। यह प्रश्न उठ सकता है कि, ऐसा करना जरुरी क्यूँ है? फिर इसके उत्तर में एक और प्रश्न मुस्कान लिए खड़ा होता है कि ऐसा न करना क्या खुद को छुपा लेना नहीं है ? खुद को उघाड़ देना ही तो मेरा होना है। मैं मेरे होने से कैसे बच सकता हूँ। इसीलिए तो मेरे होने को मैं इस किताब के दूसरे और तीसरे भाग तक ले गया; जहाँ मैं हर उस, चीज, जगह, पशु, पक्षी, कीट, पतंगे और इंसान से सम्बन्ध बनाता हुआ पाता हूँ जिनसे मैं सामाजिक रूप से उस सम्बन्ध के लिए कोई नाम नहीं दे सकता।
| Format | पेपरबैक |
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