
Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha
Original price was: ₹200.00.₹180.00Current price is: ₹180.00. (-10%)

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Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha
Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha | जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था
यह उपन्यास ‘Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha’ हमारे चारों ओर पसरते जा रहे अंधकार को चीरकर एक प्रकाश-पुंज की तरह सामने आता है। निराशा के इस जानलेवा समय में पंकज सुबीर की यह कृति हमें हौसला और उम्मीद बँधाती है। इसे पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किया जाना चाहिए और युवाओं तक निःशुल्क पहुँचाया जाना चाहिए। आज के पुस्तक और प्रेम विरोधी दौर में ऐसा कुछ किया जाना चाहिए कि ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’ उपन्यास घर-घर में पढ़ा जाए। हिन्दी के चर्चित लेखक पंकज सुबीर का तीसरा उपन्यास। पंकज सुबीर के पहले दोनो उपन्यास “ये वो सहर तो नहीं” और “अकाल में उत्सव” बहुत अधिक चर्चित रहे हैं। कई सारे सम्मान इन दोनो उपन्यासों पर प्राप्त हुए। और अब पंकज सुबीर का तीसरा उपन्याास “जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था” प्रकाशित होकर आया है। पंकज सुबीर अपनी अलग तरह की शैली तथा विशिष्ट भाषा के लिए पहचाने जाते हैं। यह उपन्यास भी उसी कड़ी में एक प्रयोग है। यह उपन्यास मानव सभ्यता के पिछले पाँच हज़ार वर्षों की कहानी कहता है। और तलाशने की कोशिश करता है कि आख़िर वो क्या है, जिसके कारण मानव सभ्यता पिछले पाँच हज़ार साल केवल लड़ाई और युद्ध में ही गँवा चुकी है। यह उपन्यास बहुत सूक्ष्मता के साथ पिछले पाँच हज़ार सालों की कहानी का अवलोकन करता है। पाठक को एक ऐसी दुनिया में ले जाता है, जहाँ वर्तमान और भविष्य के संकेत मिलते हैं।
| Weight | 200 g |
|---|---|
| Dimensions | 14 × 2 × 21 cm |
Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha
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Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha | जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था
यह उपन्यास ‘Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha’ हमारे चारों ओर पसरते जा रहे अंधकार को चीरकर एक प्रकाश-पुंज की तरह सामने आता है। निराशा के इस जानलेवा समय में पंकज सुबीर की यह कृति हमें हौसला और उम्मीद बँधाती है। इसे पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किया जाना चाहिए और युवाओं तक निःशुल्क पहुँचाया जाना चाहिए। आज के पुस्तक और प्रेम विरोधी दौर में ऐसा कुछ किया जाना चाहिए कि ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’ उपन्यास घर-घर में पढ़ा जाए। हिन्दी के चर्चित लेखक पंकज सुबीर का तीसरा उपन्यास। पंकज सुबीर के पहले दोनो उपन्यास “ये वो सहर तो नहीं” और “अकाल में उत्सव” बहुत अधिक चर्चित रहे हैं। कई सारे सम्मान इन दोनो उपन्यासों पर प्राप्त हुए। और अब पंकज सुबीर का तीसरा उपन्याास “जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था” प्रकाशित होकर आया है। पंकज सुबीर अपनी अलग तरह की शैली तथा विशिष्ट भाषा के लिए पहचाने जाते हैं। यह उपन्यास भी उसी कड़ी में एक प्रयोग है। यह उपन्यास मानव सभ्यता के पिछले पाँच हज़ार वर्षों की कहानी कहता है। और तलाशने की कोशिश करता है कि आख़िर वो क्या है, जिसके कारण मानव सभ्यता पिछले पाँच हज़ार साल केवल लड़ाई और युद्ध में ही गँवा चुकी है। यह उपन्यास बहुत सूक्ष्मता के साथ पिछले पाँच हज़ार सालों की कहानी का अवलोकन करता है। पाठक को एक ऐसी दुनिया में ले जाता है, जहाँ वर्तमान और भविष्य के संकेत मिलते हैं।
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| Dimensions | 14 × 2 × 21 cm |
Jinhe Jurm-E-ishq Pe Naaz Tha
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