बानू की ये कहानियाँ उनकी सामाजिक सक्रियता से जुड़ी हैं और कर्नाटक की मुस्लिम महिलाओं के दैनिक संघर्षों को बयां करती हैं। 1970 और 1980 के दशक में देखे गए दलित आंदोलन, किसान प्रदर्शन, भाषा आंदोलन और पर्यावरण की लड़ाई ने उन्हें सजग लेखन के लिए प्रेरित किया।
बानू की ये कहानियाँ आत्मकथात्मक हैं, जहाँ हकीकत और कल्पना का संगम है। वह कहती हैं, ‘मेरा दिल ही मेरा अध्ययन क्षेत्र है।’
उनकी कहानियाँ उन महिलाओं की आवाज़ बनती हैं, जो धर्म, समाज और राजनीति की बेड़ियों में जकड़ी हैं, लेकिन अपनी गरिमा और आज़ादी की खोज में हैं।
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